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यह धारा बताती है कि किसी वाद या कार्यवाही में केवल विवाद्यक तथ्यों और सुसंगत घोषित तथ्यों का ही साक्ष्य दिया जा सकता है, अन्य किसी का नहीं।
जो तथ्य विवाद्यक न होते हुए भी किसी विवाद्यक या सुसंगत तथ्य से इस प्रकार जुड़े हों कि वे एक ही संव्यवहार का भाग बनते हों, वे सुसंगत माने जाते हैं।
सुसंगत या विवाद्यक तथ्यों के प्रसंग, हेतुक, परिणाम अथवा उनके घटित होने का अवसर देने वाली परिस्थितियां भी सुसंगत तथ्य मानी जाती हैं।
किसी विवाद्यक या सुसंगत तथ्य का हेतु या तैयारी दर्शाने वाले तथ्य, तथा पक्षकारों या अभियुक्त का उससे प्रभावित/प्रभावित करने वाला आचरण, सुसंगत होता है।
विवाद्यक या सुसंगत तथ्य को स्पष्ट करने, उसकी पहचान, समय, स्थान या पक्षकारों का सम्बन्ध दर्शाने के लिए आवश्यक तथ्य उतने तक सुसंगत हैं जितने आवश्यक हों।
यदि दो या अधिक व्यक्तियों के अपराध हेतु षड्यंत्र करने का युक्तियुक्त आधार हो, तो एक षड्यंत्रकारी द्वारा कही, की या लिखी गई बात सबके विरुद्ध सुसंगत है।
जो तथ्य किसी विवाद्यक या सुसंगत तथ्य से असंगत हों, या जो उसके अस्तित्व/अनस्तित्व को अत्यंत संभाव्य या असंभाव्य बनाते हों, वे तथ्य सुसंगत हो जाते हैं।
जिन वादों में नुकसानी का दावा किया गया है, उनमें न्यायालय को अधिनिर्णीत की जाने वाली रकम अवधारित करने में समर्थ बनाने वाला हर तथ्य सुसंगत है।
किसी अधिकार या रूढ़ि के अस्तित्व का प्रश्न होने पर, उसे सृजित/दावाकृत/मान्यकृत करने वाले संव्यवहार और उसके प्रयोग के विशिष्ट उदाहरण सुसंगत तथ्य हैं।
आशय, ज्ञान, सद्भाव, उपेक्षा, वैमनस्य जैसी मनःस्थिति या शरीर/शारीरिक संवेदना की दशा दर्शित करने वाले तथ्य, जब वह दशा विवाद्यक या सुसंगत हो, सुसंगत हैं।