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जब कोई कथन किसी बड़े कथन, बातचीत, दस्तावेज या पत्रों की श्रृंखला का भाग हो, तो न्यायालय उतने ही भाग का साक्ष्य आवश्यक समझे जितना पूर्ण समझ के लिए आवश्यक हो।
यदि कोई निर्णय, आदेश या डिक्री विधितः किसी न्यायालय को वाद के संज्ञान या विचारण से रोकती हो, तो उसका अस्तित्व इस प्रश्न पर सुसंगत तथ्य है।
प्रोबेट, विवाह, नौवधिकरण या दिवाला अधिकारिता में सक्षम न्यायालय का अंतिम निर्णय, जो विधिक हैसियत प्रदान/समाप्त करता है, सुसंगत और निश्चायक सबूत है।
धारा 35 से भिन्न निर्णय, आदेश या डिक्री, यदि जांच में सुसंगत लोक प्रकृति की बातों से संबंधित हों, तो सुसंगत हैं, किन्तु वे निश्चायक सबूत नहीं हैं।
धारा 34, 35, 36 में वर्णित से भिन्न निर्णय, आदेश या डिक्रियां विसंगत हैं, जब तक कि उनका अस्तित्व स्वयं विवाद्यक तथ्य न हो या अन्यथा सुसंगत न हो।
वाद का कोई पक्षकार यह दर्शा सकता है कि प्रतिपक्षी द्वारा साबित की गई धारा 34-36 अधीन सुसंगत डिक्री अक्षम न्यायालय द्वारा दी गई थी या कपट/दुस्संधि से प्राप्त हुई थी।
विदेशी विधि, विज्ञान, कला, हस्तलेख या अंगुली-चिह्न की अनन्यता जैसे विषयों में विशेष कुशल व्यक्तियों (विशेषज्ञों) की रायें सुसंगत तथ्य हैं।
जब विशेषज्ञों की रायें सुसंगत हों, तब अन्यथा असुसंगत तथ्य भी सुसंगत हो जाते हैं यदि वे उन रायों का समर्थन करते हों या उनसे असंगत हों।
जब यह राय बनानी हो कि कोई दस्तावेज किसने लिखी या हस्ताक्षरित की, तो उस व्यक्ति के हस्तलेख से परिचित व्यक्ति की राय सुसंगत तथ्य है।
जब किसी साधारण रूढ़ि या अधिकार के अस्तित्व पर राय बनानी हो, तब उसका अस्तित्व होने पर उसे जानने की संभावना रखने वाले व्यक्तियों की रायें सुसंगत हैं।