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जब संविदा/अनुदान/सम्पत्ति व्ययन के निबन्धन दस्तावेज के रूप में लेखबद्ध हों, तो उनका साक्ष्य केवल वह दस्तावेज या उसका द्वितीयक साक्ष्य ही होगा, कुछ अपवादों सहित।
एक बार दस्तावेज के निबन्धन साबित हो जाने पर, उसके पक्षकारों के बीच किसी मौखिक करार का साक्ष्य निबन्धनों का खण्डन/परिवर्तन हेतु ग्रहण नहीं किया जाएगा, कुछ परन्तुकों सहित।
यदि दस्तावेज में प्रयुक्त भाषा देखते ही संदिग्धार्थ या त्रुटिपूर्ण हो, तो उसका अर्थ दर्शाने या त्रुटि की पूर्ति करने वाले तथ्यों का साक्ष्य नहीं दिया जा सकता।
यदि दस्तावेज की भाषा स्वयं स्पष्ट हो और विद्यमान तथ्यों पर ठीक-ठीक लागू होती हो, तो यह दर्शाने का साक्ष्य नहीं दिया जा सकता कि वह उन तथ्यों पर लागू करने के लिए अभिप्रेत नहीं थी।
यदि दस्तावेज की भाषा स्वयं स्पष्ट हो किन्तु विद्यमान तथ्यों के संदर्भ में अर्थहीन हो, तो यह दर्शाने के लिए साक्ष्य दिया जा सकता है कि वह किसी विशिष्ट भाव में प्रयुक्त हुई थी।
यदि प्रयुक्त भाषा कई व्यक्तियों/चीजों में से किसी एक को ही लागू हो सकती हो, तो यह दर्शाने वाले तथ्यों का साक्ष्य दिया जा सकता है कि किसे लागू करना अभिप्रेत था।
यदि भाषा आंशिक रूप से दो भिन्न तथ्य-समूहों पर लागू हो लेकिन पूर्णतः किसी पर भी नहीं, तो यह दर्शाने का साक्ष्य दिया जा सकता है कि किस पर लागू करना अभिप्रेत था।
अपठनीय या साधारणतः न समझी जाने वाली लिपि, विदेशी/अप्रचलित/तकनीकी/स्थानीय शब्दों, संक्षेपाक्षरों तथा विशिष्ट भाव में प्रयुक्त शब्दों का अर्थ दर्शाने का साक्ष्य दिया जा सकता है।
जो व्यक्ति किसी दस्तावेज के पक्षकार या उनके हित प्रतिनिधि नहीं हैं, वे उस दस्तावेज के निबन्धनों में परिवर्तन करने वाले समकालीन करार का साक्ष्य दे सकते हैं।
इस अध्याय की कोई भी बात, विल का अर्थ लगाने संबंधी भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के उपबन्धों पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी।