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साक्षियों के पेश किए जाने और उनकी परीक्षा का क्रम, सिविल/दण्ड प्रक्रिया संबंधी विधि व पद्धति से, तथा उसके अभाव में न्यायालय के विवेक से विनियमित होगा।
न्यायाधीश किसी तथ्य के साबित होने पर उसकी सुसंगति पूछ सकता है और केवल तभी साक्ष्य ग्रहण करेगा जब वह तथ्य सुसंगत प्रतीत हो; पूर्व-शर्त तथ्यों के साबित होने का क्रम भी नियंत्रित कर सकता है।
बुलाने वाले पक्षकार की परीक्षा मुख्यपरीक्षा, प्रतिपक्षी की परीक्षा प्रतिपरीक्षा, और प्रतिपरीक्षा के बाद बुलाने वाले पक्षकार की पुनः परीक्षा पुनःपरीक्षा कहलाती है।
साक्षियों की पहले मुख्यपरीक्षा, फिर प्रतिपरीक्षा, फिर पुनःपरीक्षा होती है; प्रतिपरीक्षा मुख्यपरीक्षा के तथ्यों तक सीमित नहीं, पुनःपरीक्षा प्रतिपरीक्षा में उठी बातों के स्पष्टीकरण हेतु होती है।
दस्तावेज पेश करने हेतु समनित व्यक्ति केवल उसे पेश करने मात्र से साक्षी नहीं बन जाता और जब तक साक्षी के रूप में न बुलाया जाए, उसकी प्रतिपरीक्षा नहीं की जा सकती।
शील का साक्ष्य देने वाले साक्षियों की भी प्रतिपरीक्षा और पुनःपरीक्षा की जा सकती है।
जो प्रश्न वांछित उत्तर सुझाता है वह सूचक प्रश्न है; इसे आक्षेप होने पर मुख्यपरीक्षा/पुनःपरीक्षा में न्यायालय की अनुज्ञा बिना नहीं पूछा जा सकता, परन्तु प्रतिपरीक्षा में पूछा जा सकता है।
यदि साक्षी कहे कि संविदा दस्तावेज में अंतर्विष्ट थी, तो प्रतिपक्षी उस दस्तावेज के पेश होने तक साक्ष्य पर आक्षेप कर सकता है, सिवाय स्वयमेव सुसंगत तथ्य होने वाले कथनों के।
साक्षी की उसके लिखित पूर्वतन कथनों के बारे में, लेख दिखाए बिना ही, प्रतिपरीक्षा की जा सकती है, परन्तु खण्डन हेतु उपयोग से पहले लेख के प्रासंगिक भाग की ओर उसका ध्यान आकर्षित करना होगा।
साक्षी से सत्यवादिता परखने, पहचान जानने या शील पर आघात करने वाले प्रश्न पूछे जा सकते हैं, परन्तु कतिपय यौन अपराधों में पीड़िता के शील/पूर्व लैंगिक अनुभव पर प्रश्न वर्जित हैं।