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साक्षी के परिसाक्ष्य की सम्पुष्टि हेतु, उसी तथ्य के बारे में घटना के समय या सक्षम प्राधिकारी के समक्ष किया गया उसका पूर्वतन कथन साबित किया जा सकता है।
धारा 26/27 के अधीन सुसंगत साबित कथन के बारे में, कथनकर्ता की विश्वसनीयता के खण्डन/सम्पुष्टि हेतु वे सभी बातें साबित की जा सकती हैं जो उसकी प्रतिपरीक्षा में साबित होतीं।
साक्षी परीक्षा के दौरान घटना के समय या शीघ्र बाद स्वयं लिखे गए (या पढ़कर सही जाने) लेख को देखकर अपनी स्मृति ताजी कर सकता है; अनुमति से प्रति भी देख सकता है, विशेषज्ञ वृत्तिक पुस्तकें भी।
यदि साक्षी को यकीन हो कि तथ्य दस्तावेज में ठीक-ठीक अभिलिखित थे, तो उसे विशिष्ट स्मरण न होने पर भी वह उन तथ्यों का परिसाक्ष्य दे सकता है।
स्मृति ताजी करने हेतु देखा गया लेख, प्रतिपक्षी के मांगने पर उसे दिखाया जाना और प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है; प्रतिपक्षी उस पर साक्षी की प्रतिपरीक्षा भी कर सकता है।
दस्तावेज पेश करने हेतु समनित साक्षी को आक्षेप के बावजूद उसे न्यायालय में लाना होगा; न्यायालय ग्राह्यता स्वयं विनिश्चित करेगा, अनुवादक को गोपनीयता का निदेश दे सकता है, मंत्री-राष्ट्रपति संसूचना अपवादित है।
यदि कोई पक्षकार दूसरे पक्षकार को दी गई सूचना पर मंगाई गई दस्तावेज को निरीक्षित कर ले, तो पेश करने वाले पक्षकार की मांग पर उसे साक्ष्य के रूप में देना आबद्धकर है।
यदि पक्षकार सूचना मिलने पर भी दस्तावेज पेश करने से इंकार कर दे, तो वह बाद में उसे दूसरे पक्षकार की सम्मति या न्यायालय के आदेश के बिना साक्ष्य के रूप में उपयोग नहीं कर सकता।
न्यायाधीश सुसंगत तथ्यों की खोज हेतु किसी भी साक्षी या पक्षकार से कोई भी प्रश्न पूछ सकता है और दस्तावेज पेश करने का आदेश दे सकता है, बिना आक्षेप के अधीन, परन्तु कतिपय विशेषाधिकार-सीमाओं के अधीन।