Author: आलोक कुमार | Date: 2026-09-09 23:33:25

भूमिका

झारखंड हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम फैसले में साफ किया है कि अगर कोई पत्रकार सिर्फ पुलिस अधिकारी के दिए गए बयान के आधार पर कोई खबर छापता है, तो उस पर मानहानि (Defamation) का आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि रिपोर्टर का काम सिर्फ यह होता है कि जो अधिकारी ने कहा, वह जनता तक पहुंचाए — और इसके लिए उसे आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यह फैसला पत्रकारों की सुरक्षा और प्रेस की आज़ादी के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मामला क्या था?

यह मामला है Bimlendu Narayan Ball बनाम State of Jharkhand and Ors. का, जिसकी सुनवाई झारखंड हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में हुई। शिकायतकर्ता बिमलेंदु नारायण बल देवघर के ए.एस. कॉलेज (A.S. College, Deoghar) में हेड क्लर्क के पद पर कार्यरत थे। उनका आरोप था कि कॉलेज के तत्कालीन प्रिंसिपल डॉ. एच. नारायण के कार्यकाल के दौरान 'प्रभात खबर' अखबार में एक खबर छापी गई, जिसमें कहा गया कि उन्हें सस्पेंड कर दिया गया है और उनके खिलाफ FIR दर्ज की गई है।

शिकायतकर्ता के मुताबिक, यह खबर छपने से समाज में उनकी प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगा और उन्हें काफी मानसिक तनाव झेलना पड़ा। उन्होंने अखबार से जुड़े लोगों के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया, जिसमें कॉलेज के तत्कालीन प्रिंसिपल (प्रतिवादी नंबर 2) और 'प्रभात खबर' के रिपोर्टर (प्रतिवादी नंबर 4) भी शामिल थे।

ट्रायल कोर्ट से सेशन कोर्ट तक का सफर

इस मामले में सबसे पहले ट्रायल कोर्ट ने सुनवाई की। ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादी नंबर 2 से 4 को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 500 (मानहानि) के तहत दोषी करार देते हुए एक साल की साधारण कैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद दोषी ठहराए गए लोगों ने देवघर के सेशन जज के यहां अपील दाखिल की। सेशन जज ने 26 सितंबर 2011 को दिए अपने फैसले में ट्रायल कोर्ट की सजा को रद्द कर दिया और प्रतिवादियों को बरी कर दिया। इसी सेशन कोर्ट के फैसले के खिलाफ शिकायतकर्ता बिमलेंदु नारायण बल हाईकोर्ट पहुंचे।

अपीलकर्ता का तर्क

हाईकोर्ट में अपीलकर्ता (शिकायतकर्ता) के वकील ने दलील दी कि प्रतिवादियों ने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया, जिससे यह साबित हो कि अपीलकर्ता डॉ. एच. नारायण के कार्यकाल के दौरान उनके खिलाफ दर्ज किसी मामले में जेल गए थे। वकील का कहना था कि बिना पुख्ता आधार के ऐसी खबर छापना गलत था और इससे शिकायतकर्ता की सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा, जो कि मानहानि के दायरे में आता है। इसलिए सेशन कोर्ट का बरी करने वाला फैसला गलत है और उसे पलटा जाना चाहिए।

हाईकोर्ट का निर्णय

जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय और जस्टिस अरुण कुमार राय की डिवीजन बेंच ने पूरे मामले और उस खबर की बारीकी से जांच की, जो 'प्रभात खबर' में छपी थी। कोर्ट ने पाया कि उस खबर में तत्कालीन SDPO विपुल शुक्ला का बयान दर्ज था, जिसमें उन्होंने बताया था कि कॉलेज में B.A. और B.Com. कोर्स में एडमिशन के लिए फर्जी सर्टिफिकेट जमा किए गए थे, और इस अवैध एडमिशन के लिए अपीलकर्ता समेत कुछ अन्य लोगों को जिम्मेदार पाया गया था।

प्रतिवादी नंबर 2 (तत्कालीन प्रिंसिपल) के बारे में कोर्ट ने कहा कि खबर के जिस हिस्से में उनका जिक्र था, उसमें सिर्फ एडमिशन की प्रक्रिया और हेड क्लर्क के पद के कामकाज व जिम्मेदारियों के बारे में बताया गया था। कोर्ट ने माना कि यह हिस्सा मानहानिकारक नहीं है, क्योंकि इसका सीधा संबंध सिर्फ उन मामलों से था जहां फर्जी सर्टिफिकेट के आधार पर एडमिशन दिए गए थे — और हेड क्लर्क के तौर पर उस प्रक्रिया में शिकायतकर्ता की भूमिका का उल्लेख करना गलत नहीं ठहराया जा सकता।

प्रतिवादी नंबर 4, यानी 'प्रभात खबर' के रिपोर्टर के मामले में कोर्ट ने कहा कि उन्होंने सिर्फ वही खबर छापी जो SDPO ने अपने बयान में कहा था। कोर्ट ने यह भी खास तौर पर नोट किया कि शिकायतकर्ता ने खुद SDPO के खिलाफ कभी मानहानि का कोई मुकदमा दायर नहीं किया — जबकि असली बयान उन्हीं का था। इस बात को अपीलीय अदालत (सेशन कोर्ट) ने भी अपने फैसले में गौर किया था।

न्यायालय की टिप्पणी

डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में साफ शब्दों में कहा:

"रेस्पॉन्डेंट नंबर 4 सिर्फ एक रिपोर्टर है, जिसने वही छापा जो SDPO ने कहा था। सिर्फ पुलिस अधिकारी के बयान के आधार पर खबर छापने के लिए किसी रिपोर्टर पर कोई आपराधिक जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।"

कोर्ट ने आगे कहा कि सेशन जज के फैसले में दखल देने की कोई ठोस वजह नहीं मिली, क्योंकि निचली अदालत ने सही तरीके से यह पाया था कि दोनों प्रतिवादियों — प्रिंसिपल और रिपोर्टर — का आचरण मानहानि की श्रेणी में नहीं आता।

निष्कर्ष

झारखंड हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता बिमलेंदु नारायण बल की अपील खारिज कर दी और सेशन कोर्ट के 26 सितंबर 2011 के फैसले को बरकरार रखा। साथ ही मामले से जुड़ी सभी लंबित अंतरिम अर्जियों (Interlocutory Applications) को भी बंद कर दिया गया। यह फैसला इस मायने में महत्वपूर्ण है कि यह पत्रकारों को उस स्थिति में सुरक्षा देता है जब वे किसी पुलिस अधिकारी या सरकारी अधिकारी के आधिकारिक बयान के आधार पर खबर प्रकाशित करते हैं। कोर्ट ने साफ किया कि ऐसी रिपोर्टिंग रिपोर्टर के सामान्य काम का ही हिस्सा है और इसे मानहानि जैसे आपराधिक आरोप के दायरे में घसीटना उचित नहीं होगा। हालांकि यह भी ध्यान रहे कि अगर मूल बयान देने वाला अधिकारी गलत या दुर्भावनापूर्ण बयान देता है, तो जिम्मेदारी उसी अधिकारी की बनती है, न कि उसे सिर्फ रिपोर्ट करने वाले पत्रकार की।

केस संक्षेप:

  • मामला: Bimlendu Narayan Ball v. State of Jharkhand and Ors.

  • अदालत: झारखंड हाईकोर्ट, डिवीजन बेंच

  • न्यायाधीश: जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय और जस्टिस अरुण कुमार राय

  • अपील: देवघर सेशन जज के 26.09.2011 के फैसले के खिलाफ

  • मूल आरोप: IPC धारा 500 (मानहानि)

  • निर्णय: अपील खारिज, सेशन कोर्ट का बरी करने वाला फैसला बरकरार

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